STUDENTS & LOCKDOWN

चौककर उठते ही... अंधेरे में ही तेज हो रही सांसों और धड़कनों के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश में चेहरे पर पानी के छीटें मारते हुए ही कुछ घूंट गले से उतारते हुए बालकनी में आकर खुली हवा के साथ मन को तैराना और नॉर्मल होकर ही दोबारा बैड पर लौटना...अक्सर कई ऐसे सपने जिसमें इंसान खुद को मरते, असहाय और बेबसी की जमीन की मेड़ पर खड़ा पाता है उसकी नींद तोड़ ही जाते है और कई बार सपनों में मरना ही खुद को हकीक़त में ज़िंदा रखने की जरूरत भी बन जाता है। 

तो जनाब ये शहर है दिल्ली... दिल्ली वही जिसकी हुकूमत के लिए कई सल्तनत बदल गई... रिश्ते बदल गए और राजतिलक भी अपनों के लहू से सींचे गए सौंधी खुशबू वाले फूलों से किए जाने का रिवाज़ बन गया... हुक्मरानों और राजनीति का ये केंद्र कब देश का आर्थिक पहिया और अन्य बेहतर सेवाओं की प्रगतिशील सड़क बन गया उससे ये खुद ही अनजान है। इन सबके बीच ही दिल्ली और दिल्ली वालों की बिक्री तब और बढ़ी जब स्टूडेंट्स ने अपने भविष्य बनाने का सपना आंखों में भरे दिल्ली का रुख किया और इनमें से ही एक ऐसी यूनिवर्सिटी है जहां से पढ़ने वालों कि “लाइफ सैट” हो जाने के कई दावों पर जुआ खेलना आम सी बात हो चली है... अब तक के इशारे से नाम आपके जेहन में उतर ही गया होगा।


खैर बात है फरवरी के आखिरी दिनों की बसंत पंचमी के बाद से ही दिल्ली की खूबसूरती अपने चरम पर होती है, अपनी मौसमी फिज़ाओं में कोहरे से ज्यादा धुआं और पानी से ज्यादा पाला रखने वाली दिल्ली कुछ बदली हुई सी लगती है... पेड़ों पर निकलते हुए नए पत्ते और पुराने फूलों के झड़ने से रंग बिरंगी हुई सड़कें देखना बहुत दिलकश होता है, अरावली की चट्टानों से घिसकर-टकराकर लौटने वाली हवाओं की ठंडक से माहौल फ्रेशनेस से भर उठता है, आसमान के रंग में सूरज कुछ यूं ढलने लगता है कि वो देर तक डूबना ही भूल जाता है मानो दूसरे कोने पर कोई है जिसके आने की उम्मीद में उसका इन्तज़ार लंबा हुआ जा रहा हो और इन सब के साथ ताल मिलाते हुए वो कई चीजें जो कई दफा हमारा ध्यान खींचती है उनमें जाम में खड़े वाहनों की लंबी लंबी कतारें, मेट्रो के अनाउंसमेंट और चमचमाती रोशनी की चकाचौंध शामिल है आमतौर पर इंसान को उबाऊ और चिढ़ चिढ़ा बनाने वाली यही चीजे दिल्ली का सुकून और उसकी आदत है।

और इन सबसे हटके एक स्टूडेंट के लिए तो कैंपस ही उसका मक्का-काशी है जहां की गलियां ही उसकी लुटियंस दिल्ली है। जब जिक्र कैंपस का किया ही है तो यूनिवर्सिटी का नाम भी बता ही देता हूं तो ये है दिल्ली यूनिवर्सिटी जहां एडमिशन पढ़ाई के कीर्तिमानों से ज्यादा ये देख के लिया जाता है कि कौन कौन सी हस्तियों ने यहां की सड़कों और गलियारों में चप्पलें घिसी है। 

तो अब बिना ज्यादा भूमिका दिए ही मुद्दे पर आते है तो फरवरी का अंत खास इसलिए होता है क्योंकि अब तक पूरे यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों के फेस्ट, लेक्चर सीरीज और दुनिया भर की स्कीम बिक चुकी होती है और आने वाले महीने के साथ ही बदल जाती है कई सारी चीजें जैसे मिड्सेम के बाद का एग्जाम्स का प्रेशर कैसे झेलें? मिडसेम में घर भी जाएं या ट्रिप मार लें? और भी कई उधेड़बुन के साथ रह जाता है एक स्टूडेंट और उसके कुछ 6-7 जोड़ी कपड़े जो कई सप्ताहों से खुद को साफ करने की दुहाई में कमरे कि हवाओं में अमोनिया घोल देते हैं। अपने माचिस के जैसे कमरे में पड़े रहने वाले, शिमला मिर्च की सब्जी को उबाल के खाने वाले और मलकागंज चौंक से वीसी लॉन तक ना जाने वाले भी इंस्टाग्राम पर फूडी, ट्रैवलर और एक्सप्लोरर जैसी मनगढ़ंत शब्दावली गढ़े रहते है पर ये दरअसल कैंपस की खूबसूरती ही है जो ये सब सोचने और इंसान को सोशल बनाए रखने के लिए मजबूर भी करता है। बहुत बड़े तुर्रम खां और कथित egoistic लोग भी मिडसेम के करीब आने के साथ ही अपने घर वापस ना जाने की wishlist को घरवालों के ताने और होली साथ मनाने जैसे कई ब्रह्मास्त्रों के सामने हथियार टेकने पर मजबूर होकर अपनी wishlist की बारीक सी बत्ती बनाकर कान खुजाते हुए ही packing पर लग ही जाते है, अपने कुछ कपड़े और खुद को घर की ओर निकलने का सीन सैट किए बैठते है पर घर जाने से पहले एक बार भरत-मिलाप, दोस्ती-मिलाप और आशिकी-मिलाप कुछ परंपराएं बन चुकी है जिनको नजरअंदाज करना नर्क के दरवाजे पर दस्तक देने के समान ही है तो बहुत प्यार, मुहब्बत और खुले दिल से इनको निभाने के बाद ही सब घर की ओर रुख करते है


 लेकिन इस बार मार्च के मिडसेम को कुछ और ही मंजूर था... पता नहीं कहां से पर अब टीवी में और अखबारों में किसी वायरस का जिक्र बढ़ गया था और होली मनाने के तरीकों को लेकर भी गाइडलाइन जारी की गई लेकिन इन सबसे कुछ खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि मन दिल्ली में था और शरीर घर में पर इस बीच ही ना जाने क्यों एक और चौंकाने वाली गाइडलाइन यूनिवर्सिटी ने निकाल दी की अगले 31 मार्च तक कॉलेज बंद रहेंगे। ऐसे में बहुत लाजमी था कि खुद को घर के हिसाब से ढालना जरूरत का हिस्सा बन गया, जो कई जमानो बाद घर लौटे उनके लिए इतना वक्त किसी तोहफे से कम नहीं था और जो दिल्ली रह गए थे उन्हें भी अभी घर लौटना मुनासिब सौदा लगने लगा.. कुछ दिन बीते कि अपनी आदत के तहत ही प्रधानमंत्री जी जनता कर्फ्यू की प्रार्थना कर बैठे और अगले दिन ही टीवी पर आकर 21 दिन तक देशव्यापी lockdown लगाने का फरमान सुना गया, lockdown ये क्या बला है ? कईयों ने तो जिंदगी में ये शब्द पहली दफा ही सुना.. पर जैसे जैसे ही ये पता चलना शुरू हुआ कि क्या नहीं कर सकते है तो एक वक्त के लिए तो आंखों के नीचे धुंधलापन और पैरों तले जमीन खिसक गई। आप किसी से मिल नहीं सकते, घर के बाहर निकल नहीं सकते और आवाजाही नहीं कर सकते साथ ही साथ सब transportation भी बंद कर दिए... ये कुछ ऐसा था जो सोचना भी खतरनाक हुआ जा रहा था... इस बीच कुछ तस्वीरें आनी शुरू हुई लोग मीलों अपने घरों को पैदल ही चल पड़े, शहर के शहर अब खाली होने लगे। एक स्टूडेंट जिसके लिए 31 मार्च के बाद कॉलेज तय समय पर खुल जाने चाहिए थे अब वो इस मुसीबत में था कि ये वक्त कटेगा भी तो कैसे 21 दिन भला घर में बैठना कोई आम बात थोड़े है। शुरू में कॉल हुई चार पांच दोस्त और घंटों कॉन्फ्रेंस कॉल, वीडियो कॉल और समय काटने के टिप्स और ना जाने क्या क्या पर मन ये मानने को तैयार नहीं था कि हम अब बिना मिले रहे। 21 दिन इस उम्मीद में किसी तरह गुज़रे की 22 वां दिन दोस्तों के साथ होगा। कई वॉट्सएप ग्रुप lockdown के लिए ही बने दिनभर गपशप मीम और टांग खींचना सब कुछ बहुत अच्छा हुआ जा रहा था, इंस्टा पर do/don't bingo chale, challenge accepted जैसे कई चीजें जिसने लोगों को खुद में रमाए रखा पर इन सबके बीच आ रही खबरें अच्छे संकेत तो नहीं ही दे रही थी.. केस और मौतों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा था.. केंद्र, राज्य के साथ बैठके करके आगामी महीनों में lockdown बढ़ाने की सिफारिशों को मानने पर विवश हुआ और फिर एक और lockdown अबकी स्टूडेंट के प्वाइंट ऑफ व्यू से उनकी उम्मीद और उत्साह को तोड़ने जैसा ही कुछ इस दफा देखने को मिला, ज़िन्दगी उदास होने लगी, वॉट्सएप ग्रुप के notification कम हो चले और ऑनलाइन कोर्सेज के ऑफर मुफ्त बंटने लगे, जिनको अब यकीन हो चुका था कि चीजे लंबी जाएंगी वो खुद को व्यस्त रखने की चीजे ढूंढ़ने लगे कुछ नया ट्राई करने लगे लेकिन इसी बीच जैसे ही ऑनलाइन क्लासेज और असाइनमेंट सबमिशन के notification आने शुरू हुए तो घबराहट और उबासी बढ़ने लगी.. अप्रैल खतम खोने को था और मई की दस्तक ने कई चौंकाने वाली चीजों की घोषणा कर दी पहला तो lockdown आगे बढ़ेगा दूसरा विश्वविद्यालय ऑनलाइन पेपर कराने का मन बनाए बैठा है, एग्जामिनेशन फॉर्म के link और anxiety साथ साथ ही आए। बहुत ‘कुछ करने का मन, क्या कुछ करूं' सोचने पर मजबूर हो गया टि्वटर ट्रेंडिंग और यूनिवर्सिटी के notification लगभग बराबर एवरेज से बढ़ रहे थे...देर से ही सही पर HRD की नींद खुली 1st और 2nd year को प्रोमोट करने का notification आया पर 3rd year के लिए चीजे आसान नहीं थी कोई स्पष्ट निर्देश या गाइडलाइन नहीं आई बस जिम्मेदारियों से बचते मंत्रालय खुद को भी क्वारंटाइन कर बैठे। बावजूद इसके अब चीजे एक स्टूडेंट के लिए बहुत बदल गई...जून आने को था और आने को थी कई डरावनी तस्वीरें जो उन सपनों में भी शायद ही कभी आई हो जिन्होंने दिल्ली में उन्हें सोते से जगाया। दौर कुछ ये था कि अब बहुत उदासी और नीरसता सिर पर छा गई, परिवार के साथ बातें बढ़ी पर दोस्तों के साथ बातें थमी और बातें बिगड़ना शुरू हुई... “घंटों की बातें अब ‘घंटा’ बात नहीं होती” वाले मुकाम पर आ चुकी थी। इस बीच शुरू हुई जद्दोजहद कुछ नया सीखने की कुछ प्रोडक्टिव करने की इन्हीं कोशिशों में सबने अपनी जरूरतों और इंटरेस्टेड फील्ड को फॉलो करना शुरू किया जहां एक तरफ पबजी जैसे खेलों ने देर रात तक घरों में घुसपैठ करनी शुरू की तो वहीं दूसरी ओर किताबों से दिल लगाना, पेंटिंग बनाना, डांस करना, गाना और कुकिंग की नई रेसिपी ट्राई करना और कुछ ने अपने फैमिली बिजनेस को बुनियादी तरफ से सीखना शुरू किया और यह सब बहुत आम हो चला पर बहुत हद तक ये कोशिशें थी खुद को व्यस्त करने की। थोड़ा करीब से जाना जाए तो शायद यह शौक से ज्यादा वह मजबूरी थी जिसने मुश्किल वक्त को आसान करने के नए तरीके ढूंढने पर विवश किया लेकिन इतने महीनों के लॉकडाउन ने हर घर की तिजोरी में डाका डालना शुरू किया आर्थिक स्थिति कुछ हद तक फिसल गई और कई महीनों तक बचे हुए संसाधनों से परिवार चलाने की पेरेंट्स की जिम्मेदारियां बढ़ गई, जून और जुलाई यह 2 महीने हर किसी के जीवन का वो हिस्सा रहे जहां वह मानसिक अवसाद, तनाव और घबराहट से ग्रसित रहे चाह कर भी खुद को मजबूत दिखाने वाले भी अपने करीबियों के पास लौटने को तड़प उठे। इसी बीच थर्ड ईयर के स्टूडेंट्स और विपदा में फंसते नजर आए जब बिना स्टडी मैटेरियल, प्रॉपर इंटरनेट एक्सेस और अन्य बेसिक रिसोर्सेज के दिल्ली विश्वविद्यालय ने उनकी ऑनलाइन परीक्षाएं कराने का तुगलकी फरमान जारी किया। न्याय प्रणाली की सुस्ती और सत्ताधारियों की बेरुखी को चुनौती देते हुए एक दफा फिर शुरू हुआ टि्वटर ट्रेंडिंग का दौर जहां किताबों को छोड़कर अधिकारों की लड़ाई में स्टूडेंट्स ने महीनों तक जंग लड़ी, घोषित परिणाम स्टूडेंट्स के पक्ष में नहीं रहे पर बहरे हो चुके प्रशासनिक तबके की नींद उड़ाने के लिए छात्र एकता का अनूठा प्रदर्शन अभूतपूर्व रहा। इसी बीच कई घोषणाएं हुई जहां एक ओर थर्ड ईयर एग्जाम्स और शेष स्टूडेंट्स की ऑनलाइन क्लासेज शुरू करने पर सहमति बनी। अगस्त के कुछ ही सप्ताहों ने सब कुछ फिर से बदल कर रख दिया थर्ड ईयर के एग्जाम खत्म और शेष सभी स्टूडेंट्स के बीच ऑनलाइन सोशलाइजेशन बढ़ गया। अब क्योंकि क्लासों की व्यस्तता के बीच कई सारी चीजें सामान्य हो चली है मानसिक तनाव और अपनों की यादें कुछ कम हुई पर इस दौर- ए-लॉकडाउन ने कई चीजों को लेकर नजरिया बदल दिया, नए अनुभव और नई यादें दी, इस पूरे दौर में अगर बात करें रिलेशनशिप फ्रेंडशिप की तो बहुत हद तक कम्युनिकेशन गैप आना, झगड़े होना, चीजें खराब होना और बात बंद होना बहुत आम रहा। वह ग्रुप जो कभी लॉकडाउन के लिए बने थे या उससे पहले सक्रिय थे अब सिर्फ ग्रुप ही बने रह गए उनमें पहले जैसा न बॉन्डिंग है और ना चहल पहल, कुछ लोग इस रुके हुए बढ़ते समय में छूटे तो बहुत से नए लोग मिलते चले। पुराने दोस्तों से बातें शुरू हुई, बहुत हद तक चीजें सुधर कर आई पर वो कहते हैं ना कि ‘करीब होने का एहसास दूरियां करा गई’ लेकिन इन्हीं दूरियों ने उन्हीं करीबियों के व्यवहार,विचार और उन आदतों से वाकिफ कराया जो शायद करीब रहकर कभी नहीं जानी जा सकती थी। परिवार के साथ बातें बड़ी, छोटी छोटी चीजों में खुशियां ढूंढना और ज्यादा से ज्यादा बातें करना यह दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया, वे बातें जो हम किसी दोस्त से भी नहीं कर सकते ऐसी कई बातों को इस पूरे दौर में परिवार के साथ साझा करने का आत्मविश्वास जुटा पाए। खुद को जानने का, समझने का, अपने को वक़्त देने का एक ऐसा दौर रहा जहां हम और सिर्फ हम थे और यही वजह है कि इस दौर के बाद वाले हम शायद वो ना हो जैसे हम पहले थे। लेकिन सामाजिक परिदृश्य से कई सारी चीजें उभर कर आई जैसे इस lockdown में परिजनों ने लड़कियों की ग्रेजुएशन के तुरंत बाद शादी और लड़कों को घर परिवार के काम में हाथ बंटाने के साथ ही परिवार को आर्थिक रूप से सहायता देने जैसे कई दवाब बना डाले, जिससे ये तो निश्चित हो चला है कि दिल्ली में दिन अब ज्यादा नहीं बचे है और किताबों की उम्र भी कम करनी होगी, आगे की जिंदगी इन्हीं संघर्षों के साथ गुजारते हुए जीना है। इन सबके बीच सोशल मीडिया और internet ऐसे वरदान रहे जिसने बांधे रखा फिर चाहे OTT प्लेटफॉर्म हो या अन्य सोशल साइट्स पर, एक हद के बाद ये अवसाद की वजह भी बने और उनसे दूरी बनाना या डिएक्टिवेट करना भी इस पूरे दौर का हिस्सा रहा, अपनी पुरानी यादों को साझा करके, सोशल साइट्स पर प्रोफ़ाइल मेंटेन की गई जबकि कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों ने इन्हीं मंचों पर व्यापक डिस्कशन को जगह दी लेकिन ये पूरा दौर कुछ के लिए बहुत डिप्रेशन भरा रहा लेकिन एक चौकाने वाली बात ये भी रही कि अपने डेट को डेडीकेटेड स्टोरीज ने बहुत हद तक सिंगल लोगों को निराशा की ओर बढ़ने पर मजबूर किया, बहुत ज्यादा स्टफ से उबे लोगो ने सोशल मीडिया छोड़ने में ही भलाई समझी पर एक ऐसे व्यक्ति ने भी अपने विचार रखे है जिसने डिप्रेशन के चलते दिन में 3-4 बार Masturbation करना शुरू कर दिया और उनके लिए ये पूरा दौर बहुत बुरा गुज़ार। 


कई लोग जिन्हें इस बात को लेकर भी पछतावा हो रहा है कि वो कुछ productive नहीं कर सके उन्हें इस बात को भी समझना होगा कि सीखने के लिए शांत मन चाहिए होता है जब हम खुद तनाव या अन्य मानसिक अवसादों से गुजर रहे होते है ऐसे में सीखने से ज्यादा उन दोषों को सुधारना प्राथमिकता में शामिल करना होता है जिनसे हम ग्रसित है तो अगर अब आप पहले से बेहतर है तो आपको गर्व होना चाहिए कि आप बिना किसी सहारे के खुद को संभालना सीख गए, आप ठीक है, ये कुछ ना सीखने से भी कई गुना बेहतर है। 


खैर बहुत हद तक इस लेख में हर तबके के विचारों और उसकी परेशानियों को शामिल करने की कोशिश की गई है फिर भी कोई छूट गया हो तो उसके लिए माफी.. उम्मीद है सब कुछ ठीक होगा क्योंकि काश ये हो जाता! वो कर पाते! ये सब आपके दुख को बढ़ा सकती है, चीजे सुधार नहीं सकती। ज़िन्दगी के हर पल में एक मौका है, एक नई सीख है, निर्भर आप पर करता है कि उसे बुरा सपना समझ के भूले या उस सपने में मर कर खुद को हकीकत में ज़िंदा रखे रहें। वो सुदामा की चाय, सुट्टा प्वाइंट के छल्ले, मैक्डी, केएफसी और डोमिनोज़ में दोस्तों की कंपनी,पटेल चेस्ट की चाय की टपरी पर डिस्कशन, हडसन और कमला नगर की चकाचौंध,आर्ट्स फैकल्टी-वीसी लॉन तक सड़क नापते और हाथ थामे हुए गालिब को गुनगुनाते स्वच्छंदता से बढ़ते कदमों की वेपरवाही और अदाओं में नजाकत लिए कैंपस की भरी रहने वाली सड़के हमारे इंतजार में बाहें फैलाए हुए ठहरी हुई  है, बस तब तक कुछ ना सही तो इतना ठीक रहना होगा कि हमको हमारे लिए ही खुश रहना होगा।

जय हो!

चर्चित गंगवार
इतिहास प्रतिष्ठा तृतीय वर्ष
किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।
(ये पूरा लेख 50 लोगों के निजी अनुभवों और सलाहों को समेटते हुए लिखा है, उन्हें एक व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने के अलावा लेखक का कोई पूर्वाग्रह इसमें शामिल नहीं है।)

Comments

  1. Awesome !!! Very nicely penned !!!
    ये कुछ ऐसे लेखो में से एक है जिसमें पाठक इतना मशगूल हो जाता है कि खुद को लेखक तथा कहानी को आत्मकथा समझता है !

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  2. Marvellous bhaiya,
    ❤️❤️❤️❤️❤️

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  3. अत्यन्त रमणीय 😍

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  4. बहुत ही ख़ूबसूरत🌸💖

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  5. उम्दा दोस्त❣️

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