‘महामारी में पितृसत्ता या पारिवारिक महत्वाकांक्षा'


ये लेख इशिता के ‘PANDEMIC & PATRIARCHY’ की आलोचना और इसके दृष्टिगत मेरे विचारों की प्रस्तुति है।
चूंकि लेख का शीर्षक ही पितृसत्ता से संबंधित है तो उचित रहेगा कि मैं इसे परिभाषित करूं, “ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी भी कार्य को लिंग विशेष के साथ जोड़कर दैनिक रूप से उसके अनुपालन पर बल देना तथा पुरुषों के हितों को प्राथमिकता देना।” अर्थात्  कार्य करने का चुनाव वैकल्पिक हो ना की लैंगिक आधार पर विशेषीकृत। जिस तरह के अनुभव और विचार इशिता ने साझा किए वे बहुत हद तक निजी अनुभवों को समाज के हर तबके के साथ ‘तुलना करने की जल्दीबाज़ी के रूप में देख सकते हैं क्योंकि हर वर्ग और स्तर पर पितृसत्ता की नियति बदलती है यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसका स्वरूप अगाध रूप से समाज के हर वर्ग के व्यक्ति और युवती से जुड़ा है तो अपने लेख को आगे बढ़ाने से पहले मैं यहां समाज को क्रमशः 3 वर्गों धनी या साधन संपन्न एवम् विशेषाधिकार प्राप्त, मध्यम वर्ग और औसत सुविधा प्राप्त तथा निम्न/गरीब या वंचित तबके में विभाजित करता हूं। चूंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में इन प्रत्येक वर्ग के विद्यार्थी अध्ययन करते है तो उनकी समस्याओं के अध्ययन के लिए ये विभाजन बहुत आवश्यक है। इशिता जिस व्यवस्था को पितृसत्ता कहके लॉकडॉउन में लड़कियों के शोषण के बिंदु पर बात करती है असल में ये बहुत ही सीमित दृष्टिकोण है, मैं इस व्यवस्था को कम से कम लॉकडॉउन के संदर्भ में तो ‘पारिवारिक महत्वाकांक्षा’ कहके संबोधित करूंगा। यही से मैं आपका ध्यान आकर्षित करता हूं,



 पहला वर्ग और लॉकडॉउन के दौरान उनकी दिनचर्या एवम् परिवार के साथ संबंधों पर :
जैसा कि इस वर्ग के विषय में आपको बताया जा चुका है धनी एवम् विशेषाधिकार प्राप्त ऐसा वर्ग जिसकी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भी सभी संसाधन मौजूद है और शायद ही पूरे लॉकडाउन में इस वर्ग के लोग किसी दुकान पर सामान लेने पहुंचे हों। इस वर्ग के विद्यार्थियों पर अपना अलग कमरा और अलग अलग सुविधाओं के साधन होना स्वाभाविक है, अपने रोमांच के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म या अन्य लुभावनी और उलझाए रखने वाली सुविधाओं से लैस ये विद्यार्थी अगर ‘पूरा दिन मजेदार चीजे करते हुए गुज़ार दें तो कोई अचंभित करने वाली बात नहीं है।’ ये वर्ग अपनी अपनी निजता और जीवनशैली को लेकर भी अधिक स्वच्छंदता प्राप्त है, अपने कमरे में ये रात भर फोन चलाए या जागते रहे, कभी भी सोकर उठे या कभी भी खाएं पिएं और किसी चीज को लेकर प्रश्न ना पूछा जाए तो ये बहुत स्वाभाविक ही तो है, उनके पास संसाधन है वो उनका इस्तेमाल अपने हित में कर रहे हैं चूंकि वे भी मनुष्य है तो वस्तुतः यही जीवन शैली दोहराते हुए उब जाना भी या कुछ ना करना भी उनके पक्ष में ही जाता है और अपने रुचि के अनुरूप काम करना कम से कम इस वर्ग के विद्यार्थियों पर दवाब से ज्यादा स्वयं को व्यस्त रखने का एक मार्ग खोजने जैसा है तो ये कहना कि इतना वैभवशाली वर्ग भी अपनी संतानों से दवाब देकर घर के काम करवाता है तो ये मुख्यता एक अतिशयोक्ति से अधिक कुछ भी नहीं परन्तु ये स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मेरे कहने का ये बिल्कुल भी अर्थ नहीं है कि इस वर्ग में लैंगिक भेदभाव या पितृसत्ता का कोई स्थान नहीं वरन् जिस कलक्रम और संदर्भों में हम चर्चा कर रहे हैं उसमे ये अव्यावहारिक है साथ ही इनमें पारिवारिक महत्वाकांक्षा का भी कोई स्थान नहीं है।




अब मैं बात करना चाहूंगा मध्यम वर्ग या सीमित संसाधनों वाले वर्ग पर :
इस वर्ग में प्रायः ही घर चलाने की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति के कंधों पर होना और सीमित आय के स्रोतों के बीच परवरिश करना इनके कुछ मूल चरित्र है। परिवार की आर्थिक स्थिति को समझते ही अपने अध्ययन और भविष्य पर चिंतन करना एक बेहद सामान्य विचार है। जिसमे परिवार आपको आर्थिक सहारे के रूप में देखता है ऐसे में कई बार इस लॉकडॉउन में ऐसे क्षण आए जब ‘देर से उठने, समय पर ना खाने या परिवार के साथ ना उठने बैठने पर ताने मिले’ ये किसी लिंग विशेष के प्रति अपनाया गया रुख नहीं, लड़का और लड़की दोनों के साथ ही यही व्यवहार रहा। फोन पर लंबी बाते करते रहने पर ये सुनने को मिलना कि ‘कितनी लंबी बात हो गई जो घंटो से चली जा रही है, फिर पढ़ते लिखते क्या होगे तुम्हारी तो दिल्ली में बाते ही चलती होंगी’, ‘ये देखो अमुक व्यक्ति का बच्चा बैंक में लग गया, सेना में पहुंच गया और ये हैं कि 10 बजे सोकर उठ रहे हैं’। ऐसे में घर का काम करना और उसके बीच अपनी रुचि को भी बनाए रखना मध्यम वर्गीय व्यक्ति के लिए निर्विवाद रूप से संघर्ष भरा है पर यहां लैंगिक भेदभाव या पितृसत्ता से ज्यादा पारिवारिक महत्वाकांक्षा हावी रहती है जो निश्चित ही हमारे लिए सोचते है। आगे बढ़ने से पहले आप स्वयं से प्रश्न कीजिए एक पुत्र या पुत्री के रूप में क्या आपकी अपने अभिभावक के प्रति कोई नैतिक जिम्मेदारी या कर्तव्य है कि नहीं? क्या परिवार द्वारा आपको समझाना या बुरा भला कहने में क्या उनका कोई निहित स्वार्थ है? आपसे बेहतर करने की उम्मीद करना क्या बेईमानी है? अभिभावकों के साथ बैठकर अपनी बात रखने के बजाय अपनी जिद के चलते बात बंद कर देने वाली इस पीढ़ी से क्या ये उम्मीद की जा सकती है कि वे कभी अपने अभिभावकों के दृष्टिकोण से उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को समझकर समझौता करते हुए और भविष्य की जिम्मेदारियों के लिए तैयार रहते हुए आगे बढ़े?  निश्चित ही नहीं क्योंकि हमारी स्वतंत्रता ये समझौता करने से ज्यादा खुद के अहम को अग्रणी रखने को प्राथमिकता देता है। ऐसे में ये सोचना बहुत ही अव्यावहारिक है कि लड़का आराम से बैठकर मजे ले रहा हो और उसी घर की लड़की काम कर रही जबकि घर के कार्यों का वितरण दोनों के बीच होता है और दोनों की ही मर्जी के खिलाफ पर ये पितृसत्ता नहीं वरन् उस परिवार के संचालन का वह सोपानक्रम है जिसमें जिम्मेदारियों का भार बराबर या अनचाहे रूप से वितरित है और उस परिवार के सदस्य के अलावा उस कार्य को करने के लिए और कोई अतिरिक्त विकल्प भी नहीं है। भारतीय समाज की संरचना के अनुसार विवाह के बाद स्त्री को पुरुष के घर या उसके साथ ही रहना पड़ता है ऐसे में ये कह देना कि स्त्री को वस्तु मान लिया गया है ये कहना बहुत ही अप्रिय है क्योंकि विवाह एक ऐसा संबंध है जिसमें एक स्त्री और पुरुष दोनों ही रिश्ते के वो पहिए जिनमें से किसी के भी रुकने पर जीवन के इस सफर का साथ पूरा ना होना स्वाभाविक है ऐसे में कार्यों एवम् जिम्मेदारियों का वितरण बहुत आवश्यक हो जाता है क्योंकि परिवार को संभालना और आर्थिक रूप से परिवार को संबल देना दोनों ही महत्पूर्ण पहलू है और इनमें से किसी भी संस्था को उपेक्षापूर्ण नज़रों से देखना बहुत ही संकुचित दृष्टिकोण है, तो इस पूरे लॉकडाउन में इस वर्ग के विद्यार्थी लैंगिक आधार पर भेदभाव से ज्यादा पारिवारिक महत्वाकांक्षा का शिकार हुए जहां पितृसत्ता के पक्ष को देखना बहुत ही अव्यावहारिक है।




अब बढ़ते है सबसे आखिरी निम्न वर्ग या वंचित वर्ग की ओर :
ये वर्ग जिसमे परिवार के सदस्यों को लैंगिक रूप से चिन्हित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है उन्हें सभी को आर्थिक पहियों के रूप में देखना जहां जीविकोपार्जन अर्जित करने के स्रोत ढूंढ़ना, कृषि पर आश्रित रहना और अन्य श्रम गतिविधियों के हिस्से के रूप में संघर्ष करते देखना। जहां सब काम सबके जिम्मे है, घर की स्त्री आधे घंटे पहले आकर जहां चूल्हा जलाती है तो वहीं परिवार के पुरुष सदस्य उस समय अधिक परिश्रमिकी करके अधिक रोजी पाने की लालसा में खुद को झुलसाते है, जहां अच्छी फसल या थोड़े रुपए जुड़ते ही बेटियों की डोली उठाने की विवशता रहती ताकि आने वाले वर्षों में आर्थिक साधनों कि अनिश्चितता के कारण कुंवारी बेटी घर पर ना बैठी रह जाए। इस वर्ग के विद्यार्थी अपने शौक से ज्यादा हालातो से संघर्ष करते है, संसाधनों के अभाव की विवशता के उपरांत भी विश्वविद्यालय द्वारा लादी गई अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए घर से कई किलोमीटर दूर जाकर अध्ययन करने और पड़ोसियों के फोन या डाटा पर अपनी परीक्षा देने पर विवश है। इनके जीवन में नीरसता होती भी है बावजूद इसके साधनहीनता को अपने मार्ग में बाधा ना बनते हुए, संघर्ष करते रहने को ही नियति मानते है ऐसे में इस वर्ग में लॉकडाउन जैसी विषम परिस्थिति में पितृसत्ता देखना जहां सबसे अधिक पीड़ित यही वर्ग रहा बहुत जल्दीबाजी होगी क्योंकि भूखे पेट से ना लैंगिक भेदभाव की बात होती है और ना ही प्रगतिशील नारीवादी विचार की। यहां यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि नीरसता या ऊबने के लिए अतिरिक्त समय नहीं चाहिए होता वरन् किसी प्रक्रिया को बार बार दोहराते रहने के दौरान है ये भाव अपने आगोश में लेकर कार्य करने की क्षमता को क्षीण कर देता है।
मैं मानता हूं कि पितृसत्तात्मक समाज ने चीजे बहुत मुश्किल की है लेकिन लॉकडाउन में जो कुछ हुआ वह सभी लिंग के लोगों पर समान रूप से हुआ क्योंकि पारिवारिक जिम्मेदारियां और महत्वाकांक्षाएं उसमे हावी रही। एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण से समझे तो यदि मेरी मां तबियत खराब होने पर भी खाना बनाने पर मजबूर है या पिता घर की जीविका के लिए संघर्ष कर रहे है तो ऐसे में मेरी ये डिग्री और सोशल मीडिया के आदर्शवाद शायद किसी काम के नहीं जो मुझे उनकी मदद से ज्यादा कमरा बंद करके निजता बनाए रखने पर विवश करे।  अपनी स्थिति को समाज के अन्य वर्गों के साथ तुलना करना बहुत ही हास्यास्पद है क्योंकि हर कोई अपने सीमित संसाधनों और अवसरों में संघर्ष करने पर मजबूर है।

जय हो!

चर्चित गंगवार
इतिहास प्रतिष्ठा तृतीय वर्ष
किरोड़ीमल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय।
(पूरे लेख में प्रयुक्त कोई भी उदाहरण निजी नहीं है ये लोगों के अनुभवों के आधार पर दिए गए है इसमें लेखक का कोई पूर्वाग्रह नहीं है)


Comments

  1. अती सुन्दर भाषा का प्रयोग, खराब स्तिथियों को सही तरीके से समझने का तर्कसंगत प्रयास!
    कुछ बातें/तर्क जो इस विषय पर अवश्य देखी जानी चाहिय-
    1 यह सत्य नहीं की नारियों का शोषण नही हुआ। पूरे समय जब घर के सभी पुरुष जिन्हे घर रहने और घर का काम करने की आदत नही, घर रहे, तो domestic voilence के cases विश्वभर में बड़े हैं, केवल भारत में नही। औरतों पर काम का बोझ अधिक रहा है। इसमे कोई शंका नही।
    2 परंतु, इसे व्यवस्थित रूप से किया गया पितृसत्मक शोषण कहना गलत होगा। जहाँ समृध परिवारों में करीबी बड़ी है, और लड़के लड्की में जो अन्तर है, वह अवश्य ही कम हुआ है, उदारहण स्वरूप कितने ही youtube वीडियो बने इस समय में यह दर्शाते हुए की घर के लड़कों ने पहली बार झाडू उठाया, बर्तन मान्झे, आदी घरीलू कार्य किये। वरन यह समझना होगा, की जब घर के पुरुषों ने स्त्रियों को दिन भर काम करते देखा, तो उन्हे उन्के कार्य का अहसास भी हुआ। यह हम सबने महसूस किया है!
    3 अगर data की मानें तो इसी समय में, लडकियों के सोशल मीडिया accounts में उछाल आया है। फेसबुक और youtube channels अधिक बड़े हैं, लडकियों के। इस तथ्य को गूगल ने स्वीकारा है। तो महिलाओं को स्वीकृति एवं उनका represent होना कैसे पितृसात्मक हो सकता है?
    4 महामारी का भय- भले ही कोई व्यक्ति कितना ही पितृसात्मक हो, वह अपनी माता और बहनों से उतना ही प्रेम करता है जितना अपने भाई, या पिता से, शायद अधिक भी। इस बिमारी के डर ने पुरुषों को अधिक ज़िम्मेदार बनाया है, और उनका यह मानसिक भय, अवश्य ही समाजिक स्वीकृति में बदला है।
    5 समय की मांग- यह बिमारी अनोखी है। इसमे घर के जवान पुरुषों को ही थोड़ा कम डाराया है। तो घर के बाहर महामारी में, वही घर की सारी सब्जिया, तर्कारि, दूध, आदी सामान खरीद के लाये हैं, जिसने उन्हें घर से और अधिक जोड़ा है!

    तो मैं बस इतना कहूंगा, की lockdown और इस माहामारी को एक नजरिये से ना देखा जाये। शुरु में अवश्य ही यह महिलाओं के हित में नहीं रहा, पर यह सत्य है, की पूरे विश्व में, और भारत में सबसे अधिक, इसने जो कार्य स्त्रियों के गिने नही जाते थे, जो माने नही जाते थे, जो नकारे जाते थे, उनका महत्व उजागर किया है और पितृसात्माक्ता पर यह एक बड़ी चोट रहा है!����

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